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• Tue, 9 Jan 2024 12:24 pm IST


सेठ पकौड़ा सिंह


आज सुबह-सुबह दरवाजा खटका। हमने कमरे के अंदर से ही पूछा- कौन है ?उधर से फिल्मों के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल जैसी मिमियाती आवाज आई- मैं हूँ जी, थारे मोहल्ले को नए स्टार्टअप हालो सेठ पकौड़ा सिंह। हमने उसी तरह की टोन में जवाब दिया- थारी आवाज तो बकरी बाई जैसी मरियल है । तू सिंह कैसे हो सकता है ? फिर उस आवाज ने विनम्र स्वर में कहा- भाई जी, संसद को दरवाजो तो खोलो । मैं कोई विपक्षी निष्कासित सांसद थोड़े हूँ। ऐसा नहीं है कि हम उस आवाज को पहचान नहीं रहे थे । तोताराम की श्याम वर्णी आकृति, 28 इंची विशाल वक्षस्थल और गुरुगंभीर आवाज को हम लाखों में पहचान सकते हैं।

दरवाजा खोला तो तोताराम ही नहीं उसके साथ एक उठाऊ चूल्हा और कुछ बर्तन भांडे भी थे। हमने पूछा- क्या ? यह यह सब ताम झाम लेकर अयोध्या के उद्घाटन उत्सव में पकौड़े का ठेला लगाने जा रहा है ? बोला- अयोध्या भी जाऊंगा। मैं कोई आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी थोड़े हूँ जिन्हें मोदी जी के ओवर शेडो हो जाने के डर से बहाने से न आने का इशारा किया जा रहा है । फिलहाल तो मैं पकौड़े का ‘स्टार्ट अप’ अपनी बरामदा संसद के सामने से ही करने वाला हूँ।

हमने कहा- क्यों, कल्याण बनर्जी की तरह मिमिक्री कर ले। पेट पालने के लिए लोग जाने क्या क्या करते हैं । ऐसे में तेरे पकौड़ा का ठेला लगाने से हमें कोई ऐतराज नहीं है लेकिन तेरे इस कुकर्म से किसी क्षत्रिय की भावना आहत हो सकती है । सिंह तो शिकार करते हैं पकौड़े का ठेला नहीं लगाते । सिंहों के मूँछें होती है । उनके नाम के साथ सिंह जुड़ा होता है । उनके बोलने को दहाड़ कहते हैं । वे जब चलते हैं तो धरती कांपती है। वे एक अकेले ही सब पर भारी होते हैं । तेरी इस मरियल देहयष्टि, मिमियाती आवाज और सफाचट मुखमंडल की इस ‘सिंह’ मिडिल नेम से कोई तुक नहीं बैठती । तेरा नाम तो तोताराम की तरह ‘पकौड़ा राम’ या ‘पकौड़ा प्रसाद’ होना चाहिए।

बोला- क्यों ? कुरुक्षेत्र इंजीनीयरिंग कॉलेज के सहपाठी शिखर सिंह और निधि सिंह ने क्षत्रिय ‘सिंह’ होते हुए ‘समोसा सिंह’ के नाम से समोसा बेचने का काम शुरू किया या नहीं ? सुनते हैं अब रोज हजारों समोसे बेचते हैं और महिने के लाखों रुपए कमाते हैं । और लोग हैं कि मोदी जी के ‘पकौड़ा रोजगार’ का मजाक उड़ाते हैं। हमने कहा- देखा, दो पैसे कमाने के लिए कैसे ‘डबल धमाल’ में ‘मल्लिका’ जलेबी बाई बन गई वैसे ही अच्छे भले ‘शिखर’ को ‘समोसा’ बनना पड़ गया । ‘शिखर से समोसा तक’ । लेकिन तुझे पता होना चाहिए कि उन्होंने इसके लिए बंगलुरु में अपना फ्लेट बेचकर समोसा बनाने की एक फैक्ट्री लगाई थी। तू क्या बेचकर फैक्ट्री लगाएगा ? और फिर यहाँ गली में कौन पकौड़े खाने आएगा।

बोला- तो फिर भारत की अर्थव्यवस्था को दस-बीस ट्रिलियन का और आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या किया जाए ? हमने कहा- इस 21 वीं शताब्दी का टेस्टिड उपक्रम ‘चाय विक्रय’ ही है । बिलियोनायर नहीं बनेगा तो विश्व का सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता तो बन ही जाएगा। वैसे भी इस ‘बरामदा सांसदी’ में रखा ही क्या है ? पता नहीं, कब कोई विनम्र और लोकतान्त्रिक अध्यक्ष 150 विपक्षी सांसदों की तरह एक ही झटके में बाहर का रास्ता देखा दे । फिर करते रहना संसद परिसर में गांधी प्रतिमा के सामने मिमिक्री ।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स