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• Wed, 27 Dec 2023 2:31 pm IST


दूध पीने वाले मजनू


हमने मजे लेते हुए पूछा- कल तू जिस तरह अपने को ‘मुफ़्तिया’ कहे जाने से आहत हुआ था उससे तो लग रहा था कि या तो सुबह अखबार में तेरे आत्मदाह का समाचार आएगा या फिर रात को ही बंटी आएगा कि चलो दादाजी की तबीयत ठीक नहीं है। लेकिन यह क्या ? तू तो सही सलामत !

बोला- जब धनखड़ जी ने ही न तो अपने अपमान से आहत होकर इस्तीफा दिया, न एक दो दिन का उपवास कर अपना वजन 100 से 99 किलो किया तो फिर मैं ही क्यों अनावश्यक रूप से संवेदनशील होकर रिस्क लूँ । मैंने तो तेरे यहाँ अगले 24 घंटे तक चाय पीने की आहुति देने की बात कही थी। कल से हिसाब लगा ले 24 घंटे से ज्यादा हो गए है। प्रतिज्ञा पूर्ण और मैं बरामद संसद में हाजिर।

तुझे आश्चर्य होगा कि मैंने 15 अगस्त 1947 को प्रतिज्ञा की थी कि जब तक भारत के हर व्यक्ति को रोजगार नहीं मिलेगा, सब के सिर पर पक्की छत नहीं होगी तब तक मैं आजीवन रात 10 बजे से प्रातः 4 बजे तक का क्रमिक उपवास करूंगा और उसे आज तक निभा रहा हूँ।

हमने कहा- बिल्कुल मोदी जी वाली गारंटी की तरह । हमें तो यह धनखड़ जी का बिना नाखून कटाये ही शहीद का दर्जा लेने का घटिया नाटक लगता है । खुद्दार आदमी ऐसे मामलों में एक्शन पहले लेता है और घोषणा बाद में करता है । तुझे पता होना चाहिए कि हिन्दी के प्रसिद्ध संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी जी 1904 में रेलवे में 200 रुपए मासिक की नौकरी करते थे। हिसाब लगा ले। उन दिनों सोने का भाव था 20/- रु। तोला मतलब साढ़े बारह ग्राम। और आज साढ़े बारह ग्राम सोने का भाव ! तुलना कर ले । उनके एक नए नए अंग्रेज अधिकारी आए जिन्होंने तनिक अशिष्टता का व्यवहार किया तो द्विवेदी जी ने इस्तीफा देकर 20/-रु महिने की सरस्वती पत्रिका की संपादकी कर ली। ये तो अपने अपमान का जातीय कार्ड खेलकर परोक्ष रूप से अगले चुनाव में भाजपा की मदद कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप हो सकता है एक स्टेप ऊपर वाली सर्वोच्च कुर्सी मिल जाए।

हाँ, कल के अपमान प्रकरण से रात को हमारी तबीयत जरूर खराब हो गई। ढंग से नींद नहीं आई । धनखड़ जी के पद और जाति के अपमान को लेकर सोचते रहे तो अपमान की यह शाब्दिक और नाटकीय खुजली जाने हमें कहाँ-कहाँ ले गई।

बोला- लेकिन तुझे तो किसी ने कुछ नहीं कहा। उलटे तूने ही मुझे मुफ्ती कहा । एक सड़ियल चाय में अस्सी साल के एक ब्राह्मण अध्यापक को मुफ्ती कहकर अपमान । मेरा तो मन किया था कि इस बरामदा संसद में कल से पैर तक नहीं रखूँगा लेकिन फिर सोच तेरा अकेले का क्या होगा ? किससे लोकनिंदा करेगा। कैसे दिन कटेंगे।

कल्पना कर यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सभी सीटें भाजपा की ही हों। कोई विपक्ष हो नहीं । कोई प्रश्न पूछने वाला ही नहीं हो । सभी ‘मोदी मोदी’ करने वाले ही हों तो धनखड़ जी किसे निलंबित करके मोदी जी को खुश करेंगे । मोदी जी किसकी मिमिक्री करेंगे ? किसकी गर्ल फ्रेंड की कीमत लगाएंगे ? मैच जीतने से जो खुशी होती है वह ‘वाक ओवर’ मिलने से नहीं होती । मीठा ही मीठा खाते खाते एक स्थिति में उबकाई आने लगती है । किसको गांधी नेहरू का निंदा-पाठ सुनाएंगे ?

लेकिन तुझे मेरे कल के अपमान और धनखड़ प्रकरण से बेचैनी क्यों हुई ?

हमने कहा- तोताराम, धनखड़ जी के अपमान से हमारे कई और संदर्भ जुड़ गए जिन्होंने हमें बेचैन कर दिया । वे हमारे गाँव चिड़ावा के पास के एक गाँव किठाना के हैं । प्राइमरी में हमारे भाई साहब के शिष्य रहे हैं । उनके सिर के सारे बाल भी हमारी तरह सफेद हो चुके हैं और फिर वे भी हमारी तरह मनुष्य हैं तो उनके हिस्से का कुछ अपमान तो हम पर भी लागू होता ही होगा।

बोला- लेकिन तुझ पर पूरा अपमान लागू नहीं हो सकता । अगर माने भी तो अपमान अधिक से अधिक उनके अपमान का 50 प्रतिशत हो सकता है क्योंकि उनका वजन 100 किलो है और तेरा 50 किलो । वैसे तू नेताओं को सीरियसली मत लिया कर । ये सब दूध पीने वाले मजनू हैं।

हमने कहा- संसद में मजनू कहाँ से आ गया और वह भी दूध पीने वाला।

बोला- लैला के परिवार वालों और गली मोहल्ले के लोगों द्वारा किए गए अपमान और मिमिक्री के बावजूद मजनू ने लैला का मोहल्ला नहीं छोड़ा । लोगों ने भी ध्यान देना बंद कर दिया । लेकिन लैला को मजनू की फिक्र बनी रहती । वह घरवालों से छुपकर अपनी सहेलियों के हाथ मजनू के लिए दूध भिजवाती । मजनू दूध की तरफ देखता भी नहीं। लैला को चिंता लगी रहती।

एक दिन लैला ने पूछा- अब मजनू का क्या हाल है ? सहेलियों ने बताया- अब तो दूध पी लेता है । स्वास्थ्य भी ठीक हो रहा है।

लैला को शक हुआ । उसने सहेलियों से कहा- आज जब दूध का लेकर जाओ तो मजनू के दूध पी लेने के बाद कहना कि लैला की तबीयत ठीक नहीं है । हकीम साहब ने कहा है कि मजनू के एक प्याला खून से दवा बनाकर देने से ही लैला ठीक हो सकती है। नहीं तो मर जाएगी।

एक प्याला खून की बात पर मजनू ने कहा- असली मजनू तो यहाँ से उठकर उस पेड़ के नीचे जा बैठा है। खून चाहिए तो उसके पास जाओ। हम खून देने वाले नहीं, हम तो दूध पीने वाले मजनू हैं।


सौजन्य से : नवभारत टाइम्स