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DevBhoomi Insider Desk
• Wed, 17 May 2023 11:44 am IST


DU के एडहॉक टीचरों में क्यों छाई मायूसी


अजीब बात है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में एक दशक से भी ज्यादा इंतजार के बाद असिस्टेंट प्रफेसर की स्थायी नियुक्तियां शुरू हुईं और इससे उम्मीद, खुशी का माहौल बनने के बजाय नाराजगी, आशंका और मायूसी का भाव फैलता दिख रहा है। नियुक्ति प्रक्रिया में पक्षपात और धांधली के आरोप अपने देश में नए नहीं हैं। इसलिए अगर बात उतनी ही होती तो शायद मामला इतना तूल न पकड़ता। लेकिन जितने बड़े पैमाने पर असंतोष देखा जा रहा है, उससे कई सवाल खड़े होते हैं।

आगे बढ़ने से पहले, एक बार उस पृष्ठभूमि को समझ लेना बेहतर होगा जिसमें मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया चलाई जा रही है।

डीयू में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दिया जाए तो 2010 के बाद से शिक्षकों की स्थायी भर्तियां नहीं हुई हैं।उनकी जगह एडहॉक टीचरों से काम चलाया जा रहा है जिनकी तनख्वाह असिस्टेंट प्रफेसर के शुरुआती वेतन के बराबर होती है लेकिन ग्रैच्युटी, पेंशन जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
हर चार महीने पर उनके कार्य की समीक्षा होती है और फिर कॉन्ट्रैक्ट का रीन्युअल होता है।
ऐसे शिक्षक सिर्फ इस उम्मीद में बरसों से पढ़ाते चले आ रहे हैं कि कभी न कभी उन्हें स्थायी कर दिया जाएगा।
डीयू में इन एडहॉक शिक्षकों की अच्छी खासी तादाद है। माना जाता है कि मौजूदा टीचिंग वर्कफोर्स का करीब 40 फीसदी एडहॉक ही हैं।

ऐसे में जब पिछले साल डीयू में बड़े पैमाने पर असिस्टेंट प्रफेसरों की स्थायी नियुक्ति की बात चली, तो इन शिक्षकों को बरसों की अपनी उम्मीद पूरी होती नजर आई। करीब 4500 पदों पर नियुक्ति होनी है जिनमें से लगभग 2000 पद भरे जा चुके हैं। बाकी के लिए इंटरव्यू चल रहे हैं। लेकिन जैसा रंग-ढंग इन नियुक्तियों का दिख रहा है, उसमें एडहॉक टीचर्स की यह कम्युनिटी हताश होती जा रही है। पिछले महीने एक एडहॉक टीचर समरवीर सिंह की कथित खुदकुशी को इस बिरादरी में बनते फ्रस्टेशन, गुस्सा और बेबसी का सबूत बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, समरवीर सिंह डीयू के हिंदू कॉलेज में छह साल से फिलॉसफी पढ़ा रहे थे, लेकिन इंटरव्यू में रिजेक्ट किए जाने और फिर कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद डिप्रेशन में चले गए थे। इसे सिर्फ एक उदाहरण या महज संयोग कहकर टाला जा सकता था, लेकिन कई तथ्य हैं जो एडहॉक टीचरों की ओर से लगाए जा रहे पक्षपात और मनमानी के आरोपों को बल प्रदान करते हैं।

2018 में यूजीसी नियमों में बदलाव के जरिए इंटरव्यू को 100 फीसदी वेटेज दे दिया गया। उससे पहले तक इंटरव्यू को सिर्फ 20 फीसदी वेटेज मिलता था। 80 फीसदी वेटेज पढ़ाने का अनुभव, अकादमिक कार्य और बेहतर शैक्षणिक प्रदर्शन को मिलाकर बनता था।2018 के इस बदलाव के चलते इंटरव्यू बोर्ड के हाथों में सारी ताकत आ गई। वह प्रत्याशियों के अनुभव, शैक्षणिक योग्यता, अकादमिक शोध आदि तमाम चीजों को दरकिनार कर उसे अयोग्य करार दे सकता है।

आज एडहॉक टीचर्स यही कह रहे हैं कि उनकी सालों की मेहनत, दक्षता और अनुभव को दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में खारिज किया जा रहा है। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन इस पूरी कवायद का मकसद एडहॉक टीचर्स को चार महीने के कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम से मुक्ति देना बताता है और यह भी सच है कि नियुक्ति की कोई भी व्यवस्था अपना ली जाए, शिकायतों और आरोपों की गुंजाइश पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती। फिर भी, प्रत्याशियों की शैक्षणिक योग्यता, अकादमिक कार्य, एडहॉक टीचर के रूप में अनुभव आदि को पर्याप्त वेटेज देकर और नियुक्ति प्रक्रिया को यथासंभव पारदर्शी बनाकर इसे कुछ विश्वसनीयता जरूर दी जा सकती है और डीयू में टीचिंग के काम में अपनी जिंदगी के बेहतरीन साल खपा देने वालों को यह अहसास भी कि सिस्टम की नजरों में उनका योगदान निरर्थक नहीं है।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स