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• Wed, 17 Jul 2024 11:06 am IST


पापा बचा लेंगे


पुणे और मुंबई के बहुचर्चित हिट एंड रन मामलों ने दिल्ली के 25 साल पुराने संजीव नंदा केस की यादें ताज़ा कर दीं। ये तीनों हाईप्रोफाइल मामले बताते हैं कि अगर आप अमीर और रसूखदार हैं तो किसी को अपनी गाड़ी तले रौंदने के बावजूद सारा तंत्र आपको बचाने में लग जाता है। 19 मई को पुणे में एक बड़े बिल्डर के नाबालिग बेटे ने तेज़ रफ्तार पोर्शे कार से बाइक सवार दो युवाओं को कुचल दिया। हादसे के बाद जिस तरह से खून के सैंपल बदलकर अभियुक्त को बचाने की कोशिश हुई, उसने सरकारी विभागों पर कई सवाल उठा दिए।

हालांकि यह मामला भी ऐसी कई घटनाओं की तरह ही दबकर रह जाता, अगर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के जज आरोपी लड़के को महज़ 300 शब्दों का निबंध लिखने की सज़ा नहीं सुनाते। नशे में दो युवा ज़िंदगियां छीनने वाले को इतनी मामूली सज़ा मिलने की खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा भड़क उठा। हंगामा मचा तो पूरा प्रशासनिक अमला हरकत में आया। परतें खुलीं तो सारे विभाग कठघरे में आ गए। आखिर एक नाबालिग को बार में शराब कैसे परोसी गई? नशे में धुत होकर जो कार वह चला रहा था, वह बिना रजिस्ट्रेशन और नंबर प्लेट के कैसे चल रही थी, क्या ट्रैफिक पुलिस की कभी नज़र नहीं पड़ी?

मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि दौलत और शराब के नशे में चूर ऐसे ही एक अन्य युवा ने मुंबई में अपनी बीएमडब्लू कार से महिला को बुरी तरह कुचल डाला। इस नेता पुत्र को बचाने की काफी कोशिशें हुईं पर पुणे केस में हाथ जला चुकी महाराष्ट्र सरकार इस बार कोई चूक नहीं चाहती थी। पुलिस से छुपते फिर रहे युवक को घटना के 60 घंटे बाद गिरफ्तार तो किया गया लेकिन पुलिस ने इसे ड्रिंक एंड ड्राइव के बजाय हिट एंड रन में दर्ज किया। दबाव बढ़ा तो पुलिस को मानना पड़ा कि अभियुक्त पूरी तरह नशे में था।

1999 में दिल्ली का नंदा केस तो कई साल तक सुर्खियों में रहा। पूर्व नौसेना प्रमुख के पोते ने लोधी रोड इलाके में अपनी बीएमडब्लू कार से छह लोगों को कुचल दिया था। घटना के बाद सबूत मिटाने के साथ ही गवाहों को प्रभावित करने की कोशिशें तब भी खूब हुईं। लेकिन मामला रसूखदार परिवार से जुड़ा था तो पूरे देश की निगाहें इस पर टिक गईं। आखिरकार 2008 में आरोपी को सज़ा हुई।

25 साल बाद भी कुछ नहीं बदला। आज भी वही सब कहानी दोहराई जा रही है। क्या कानून इतने कमज़ोर हैं कि लोगों में खौफ नहीं? बेंगलुरू में पिछले एक दशक में हुए ऐसे हादसों में मात्र एक में ही सज़ा हो पाई है। मोटर वीकल अमेंडमेंट एक्ट 2019 में ड्रंकन ड्राइविंग के जुर्माने में काफी बढ़ोतरी की गई, लेकिन उसका कोई असर नहीं दिखता। हाल में लागू भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 में लापरवाही से गाड़ी चलाकर जान लेने पर पांच साल तक की सज़ा का प्रावधान है, वह भी अगर पुलिस को सूचित किया तब। बिना सूचना दिए भागने पर दस साल की सज़ा होगी।

क्या इससे ऐसी घटनाएं रुकेंगी? लगता नहीं क्योंकि रसूख वालों की औलादों को लगता है कि वे कुछ भी कर लें, पापा उन्हें बचा लेंगे। यहीं से उनके संवेदनहीन होने की शुरुआत हो जाती है। सड़क पर चलते लोग उन्हें कीड़े मकौड़े लगते हैं। कई साल पहले मुंबई में एक सिलेब्रिटी ने फुटपाथ पर सोते लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी थी। बाद में तर्क दिया कि फुटपाथ सोने की जगह नहीं है। उन्हें कौन बताए कि फुटपाथ गाड़ी चढ़ाने की जगह भी नहीं है।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स