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DevBhoomi Insider Desk
• Mon, 17 Jun 2024 11:17 am IST


क्या यूरोप में बढ़ेगा राष्ट्रवाद का जोर


यूरोपीय संसद के चुनाव ऐसे तो बहुत ज्यादा चर्चा में नहीं होते लेकिन इस बार उसके चुनाव नतीजों पर उसी तरह बात हो रही है, जैसे किसी और महाशक्ति के आंतरिक चुनाव पर होती है। आलम यह है कि इसके असर में फ्रांस के आम चुनाव घोषित हो गए हैं और जर्मनी में भी इसकी मांग उठने लगी है।

ऐतिहासिक मोड़

इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि यूरोप अभी एक ऐतिहासिक मोड़ से गुजर रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा युद्ध यूक्रेन की जमीन पर चल रहा है, जिसमें एक तरफ रूस है और दूसरी तरफ सारे नैटो (NATO) देश। इस लड़ाई में एक तरफ धन की बर्बादी हो रही है, दूसरी तरफ तेल और गैस समेत बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन, जिन पर यूरोप की संपदा निर्भर करती थी, रूस से आने बंद हो गए हैं।

विस्थापितों की बाढ़

अगली बड़ी समस्या यह है कि पूरा मध्यपूर्व, जिसमें पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका शामिल हैं – लीबिया, सीरिया, इराक और लेबनान से लेकर अफगानिस्तान तक- पूरा इलाका अभी उजड़ा पड़ा है और वहां से बड़ी संख्या में लोग भागकर यूरोप जा रहे हैं। दसियों लाख लोग तुर्की और इटली के रास्ते यूरोप के शहरों में भर गए हैं। पेरिस और बर्लिन से लेकर मिलान और वारसा तक कई मशहूर शहर, जो सदियों से अपने सुंदर रखरखाव के लिए जाने जाते रहे हैं, अभी विशाल झुग्गी झोपड़ियों से कसे हुए नजर आ रहे हैं।

महंगाई और बेरोजगारी 

इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि यूरोप का कम पढ़ा लिखा मैनुअल लेबर वाला तबका या तो बेरोजगार हो गया है या उसको बहुत कम मजदूरी पर काम करना पड़ रहा है। महंगाई और बेरोजगारी की शक्ल में जाहिर हो रहे इन दोनों मुद्दों को लेकर यूरोप में काफी गुस्सा है।

कब थमेगी लड़ाई

दो यक्ष प्रश्न लोगों के सामने हैं – यूक्रेन की लड़ाई कब ठंडी पड़ेगी और विस्थापितों की वापसी का कुछ हो पाएगा या नहीं। दोनों मसले सबसे ज्यादा तीखे ढंग से फ्रांस, जर्मनी और इटली की अति राष्ट्रवादी पार्टियों ने उठाए हैं और यूरोपीय संसद के चुनाव में उनके वोट 2019 के मुकाबले डेढ़ से दो गुना हो गए हैं। इन नतीजों का एक संदेश साफ है कि यूक्रेन की लड़ाई में अधिक से अधिक कुर्बानी देने की अमेरिकी पुकार यूरोप में पहले से कम सुनी जाएगी।

यूरोपीय एकजुटता 

यूरोपीय संसद को समझना हो तो यह यूरोप के एकीकरण के सात स्तरों और कानून बनाने से जुड़े तीन स्तरों वाले ढांचे में एक है। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद यूरोप समझ गया कि आपस में युद्ध का रास्ता उसे कहीं का नहीं छोड़ेगा। एकजुटता की कोशिशों के क्रम में अब से 71 साल पहले यूरोपियन पार्लियामेंट का गठन हुआ, हालांकि इसके लिए हर पांच साल पर होने वाले चुनाव 1979 से होने शुरू हुए।

त्रिस्तरीय व्यवस्था 

यह संसद एक त्रिस्तरीय व्यवस्था के बीच में पड़ती है। सबसे ऊपर यूरोपियन कमिशन है जो किसी मुद्दे पर कोई प्रस्ताव रखता है। यूरोपीय संसद उस पर बहस और वोटिंग करती है। अंत में राष्ट्रीय सरकारों के प्रतिनिधियों को लेकर गठित 27 सदस्यीय यूरोपियन काउंसिल अंतिम रूप से यूरोपीय संसद की राय को स्वीकारती है, नकारती है, उसमें कोई सुधार करती है या फिर उसका कोई सदस्य उसे वीटो कर देता है।

ज्यादा सीटें जर्मनी को 

यूरोपीय संसद में अभी 720 सीटें हैं। 2019 के चुनाव में इसमें 705 सीटें थी। सबसे ज्यादा यूरोपीय सांसद जर्मनी से, फिर फ्रांस, इटली और स्पेन से चुनकर आते हैं। सबसे कम, छह-छह सीटें माल्टा और लक्जमबर्ग को मिली हुई हैं। यूरोपीय संसद में अलग-अलग मिजाज की पार्टियों को मिलाकर बने गुटों में ये सांसद बैठते हैं।

अधिकार में कमी का दबाव 

इस बार के चुनाव नतीजों का एक और खराब पहलू यूरोपियन यूनियन के अधिकारों में कमी का दबाव बनने का है। इसकी वकालत करने वाली पार्टियों ने पहली बार लगभग एक चौथाई सीटें जीत ली हैं, जो उनके इतिहास का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। इस्टैब्लिशमेंट की जो पार्टियां हैं, उनमें जर्मनी की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन जैसे मध्य-दक्षिणपंथी दलों ने सबसे ज्यादा 191 सीटें जीती हैं। उसके बाद 125 के लगभग सीटें सोशल डेमोक्रेट्स ने जीती हैं। इन दोनों को इस्टैब्लिशमेंट की पार्टी कहा जाता है जो कि यूरोपियन यूनियन का होना सुनिश्चित करते हैं। यानी यूरोपियन यूनियन के अस्तित्व पर फिलहाल खतरा नहीं है।

राष्ट्रों की पहचान पर जोर

फ्रांस के मैक्रों वाली लिबरल धारा और पर्यावरण के लिए लड़ने वाली ग्रीन पार्टियां कमजोर हुई हैं और दूसरी तरफ यूरोपीय संघ के बजाय राष्ट्रों की पहचान पर ज्यादा जोर देने वाली पार्टियां मजबूत हुई हैं। इससे ऐसा लगता है कि अगले पांच सालों में, खासकर अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के चुन लिए जाने की स्थिति में अमेरिका और यूरोप का नया कॉम्बिनेशन यूक्रेन के लिए नुकसानदेह साबित होगा। यह भी संभव है कि रूस और यूरोप के बीच का तेल और गैस आयात का जो इंफ्रास्ट्रक्चर समाप्त हो गया है, उसको फिर से खड़ा करने की मांग तेज हो जाए।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स