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DevBhoomi Insider Desk
• Thu, 16 Mar 2023 3:17 pm IST


जब कौर भर में पहलवान मांगने लगा पानी


हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार भीष्म साहनी ने 1956 में मध्य वर्ग पर एक कहानी लिखी थी, ‘चीफ की दावत।’ दावत की इस कहानी में समाज का वह चेहरा दिखा था, जो आमतौर पर नहीं दिखता। अब इसे संयोग कहें या कुछ और कि अवध के मशहूर इतिहासकार अब्दुल हलीम ‘शरर’ ने अपनी लोकप्रिय कृति ‘गुजिश्तां लखनऊ’ में उनसे सौ साल पहले भी एक दावत का जिक्र किया था। यह दावत एक हकीम ने एक पहलवान को दी थी, जो उस वक्त के अभिजात वर्ग के विलासिता भरे खान-पान और ‘ताकत प्रदान करने वाली गिजा’ से जुड़ी चीजों की पोल खोलती है।

हकीम बंदा मेहंदी
1857 के बाद के लखनऊ की यह कहानी बंदा मेहंदी नाम के खाने-खिलाने के शौक के लिए मशहूर हकीम के दौलतखाने से शुरू होती है। हकीम ने ऐसे पहलवान को दावत दी, जो रोज सुबह बीस सेर दूध पीता और ढाई-तीन सेर पिस्ते-बादाम खाता। इतना ही नहीं, दोपहर और शाम को ढाई सेर आटे की रोटियां और मझोले कद के बकरे का सारा गोश्त हजम कर जाता था।

कहानी के मुताबिक पहलवान दावत का न्योता पाकर हकीम के दौलतखाने पहुंचा तो उसके नाश्ते का वक्त हो चुका था। इसलिए भूख की बेचैनी में वह थोड़ी देर ही सब्र कर पाया और जब देखा कि हकीम को उसे ‘तृप्त’ कराने की फिलहाल कोई जल्दी नहीं है तो संकोच त्याग कर तकाजा करने लगा। यह भी कह दिया कि अब उससे रहा नहीं जा रहा। लेकिन हकीम उसे तब तक टालता रहा, जब तक वह नाराज होकर बिना तृप्त हुए ही लौट जाने की धमकी नहीं देने लगा। इस धमकी के बाद हकीम उठा भी तो जैसे-तैसे उसे थोड़ा और सब्र रखने को राजी करने के बाद यह वायदा कर अंदर चला गया कि ‘इंतजार की घड़ियां खत्म होने तक के लिए कुछ भिजवाता हूं।

छटांक भर पुलाव
इसके अगले ही पल एक सेविका ने करीने से ढंका हुआ एक बड़ा-सा थाल लाकर पहलवान के सामने रख दिया। उसे देखकर पहलवान की जान में थोड़ी जान तो जरूर आई, लेकिन उसने थाल से पर्दा हटाया तो पाया कि उसमें एक छोटी-सी तश्तरी में महज छटांक भर पुलाव है, जो उसके एक कौर के लिए भी काफी नहीं। यह क्या मजाक है! उसने सोचा और उतना भी खाए बिना जाने को उठ खड़ा हुआ। वहां बैठे बाकी लोगों ने समझाना-बुझाना शुरू किया तो तैश में आकर तश्तरी का सारा पुलाव उसने एक बार में ही मुंह में डाला और बगैर मुंह चलाए निकल गया। लेकिन पांच मिनट बाद ही लौटा और पानी मांगने लगा। फिर तो पांच-पांच मिनट के अंतर से उसने कई बार पानी पिया और खूब डकारें लीं।

तब तक दस्तरखान बिछ गया, सजे-धजे थाल आ गए और खाना ‘चुना’ जाने लगा। (तब लखनऊ में खाना ‘परोसा’ नहीं बल्कि ‘चुना’ जाता था।) अब हकीम ने पहलवान की ओर उसी पुलाव की पाव भर की थाली बढ़ाई और कहा, ‘लीजिए, पहलवान साहब! खाइए। मुझे अफसोस है कि इसके बनने में देरी से आपको तकलीफ उठानी पड़ी।’

पहलवान की तौबा
लेकिन पहलवान ने तौबा-सी करते हुए कहा, ‘हकीम साहब, अब तो मुझे माफ ही कर दीजिए। मैं इतना अघा चुका कि अब एक चावल भी नहीं खा सकता।’ हकीम फिर भी इसरार पर इसरार करता और पहलवान कहता रहा, ‘अब खाऊं तो भला कैसे खाऊं? पेट में जगह ही नहीं बची।’ फिर हकीम ने सारा पुलाव अपने पेट के हवाले कर लिया और तंज करते हुए कहने लगा, ‘पहलवान साहब! बीस-तीस सेर खा जाना इंसान की नहीं, बैलों-भैंसों की गिजा होती है। इंसान की गिजा तो ऐसी होनी चाहिए कि वह बस दो कौर खाए और बीस-तीस सेर गल्ला या गोश्त वगैरह खाने के मुकाबले ज्यादा ताकत और फुर्ती पाए। बहरहाल, मेरी ओर से कल फिर आपकी दावत।’

अगले दिन पहलवान आया तो बोला, ‘हकीम साहब! आपके पुलाव के एक कौर पर बीस सेर दूध, सेरों मेवे, गोश्त और गल्ला कुर्बान। कल जैसी ताकत और फुर्ती मैंने इससे पहले जिंदगी में कभी नहीं पाई।’ सुनकर हकीम मूंछों में मुस्कुराने लगा।

सौजन्य से : नवभारत टाइम्स